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जोर्ज पेश शोर शायरी | शाही शायरी

जोर्ज पेश शोर शेर

20 शेर

रुके है आमद-ओ-शुद में नफ़स नहीं चलता
यही है हुक्म-ए-इलाही तो बस नहीं चलता

जोर्ज पेश शोर




जब जवानी गई छुड़ा कर हाथ
उस पे पीरी न कुछ चली दिल की

जोर्ज पेश शोर




जहाँ में ज़र का है कारख़ाना न कोई अपना न है यगाना
तलाश-ए-दौलत में है ज़माना ख़ुदा ही हाफ़िज़ है मुफ़्लिसी का

जोर्ज पेश शोर




नहीं है टूटे की बूटी जहान में पैदा
शिकस्ता जब हुआ तार-ए-नफ़स नहीं चलता

जोर्ज पेश शोर




पैक-ए-ख़याल भी है अजब क्या जहाँ-नुमा
आया नज़र वो पास जो अपने से दूर था

जोर्ज पेश शोर




तुम्हारे इश्क़ में क्या क्या न इख़्तियार किया
कभी फ़लक का कभी ग़ैर का वक़ार किया

जोर्ज पेश शोर




ज़र्रे की तरह ख़ाक में पामाल हो गए
वो जिन का आसमाँ पे सर-ए-पुर-ग़ुरूर था

जोर्ज पेश शोर




उस माह-रू पे आँख किसी की न पड़ सकी
जल्वा था तूर का कि सरासर वो नूर था

जोर्ज पेश शोर




जान पर अपनी हाए क्यूँ बनती
बात जो मानते कभी दिल की

जोर्ज पेश शोर