EN اردو
एजाज़ गुल शायरी | शाही शायरी

एजाज़ गुल शेर

25 शेर

कुछ देर ठहर और ज़रा देख तमाशा
नापैद हैं ये रौनक़ें इस ख़ाक से बाहर

एजाज़ गुल




कोई सबब तो है ऐसा कि एक उम्र से हैं
ज़माना मुझ से ख़फ़ा और मैं ज़माने से

एजाज़ गुल




कभी क़तार से बाहर कभी क़तार के बीच
मैं हिज्र-ज़ाद हुआ ख़र्च इंतिज़ार के बीच

एजाज़ गुल




जो क़िस्सा-गो ने सुनाया वही सुना गया है
अगर था इस से सिवा तो नहीं कहा गया है

एजाज़ गुल




अजीब शख़्स था मैं भी भुला नहीं पाया
किया न उस ने भी इंकार याद आने से

एजाज़ गुल




हो नहीं पाया है समझौता कभी दोनों के बीच
झूट अंदर से है सच बाहर से उकताया हुआ

एजाज़ गुल




हवा के खेल में शिरकत के वास्ते मुझ को
ख़िज़ाँ ने शाख़ से फेंका है रहगुज़ार के बीच

एजाज़ गुल




हर मुलाक़ात का अंजाम जुदाई था अगर
फिर ये हंगामा मुलाक़ात से पहले क्या था

एजाज़ गुल




हैरत है सब तलाश पे उस की रहे मुसिर
पाया गया सुराग़ न जिस बे-सुराग़ का

एजाज़ गुल