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बक़ा उल्लाह 'बक़ा' शायरी | शाही शायरी

बक़ा उल्लाह 'बक़ा' शेर

25 शेर

मत तंग हो करे जो फ़लक तुझ को तंग-दस्त
आहिस्ता खींचिए जो दबे ज़ेर-ए-संग दस्त

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'




इश्क़ ने मंसब लिखे जिस दिन मिरी तक़दीर में
दाग़ की नक़दी मिली सहरा मिला जागीर में

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'




काबा तो संग-ओ-ख़िश्त से ऐ शैख़ मिल बना
कुछ संग बच रहा था सो उस बुत का दिल बना

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'




कल के दिन जो गिर्द मय-ख़ाने के फिरते थे ख़राब
आज मस्जिद में जो देखा साहब-ए-सज्जादा हैं

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'




ख़ाल-ए-लब आफ़त-ए-जाँ था मुझे मालूम न था
दाम दाने में निहाँ था मुझे मालूम न था

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'




ख़्वाहिश-ए-सूद थी सौदे में मोहब्बत के वले
सर-ब-सर इस में ज़ियाँ था मुझे मालूम न था

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'




क्या तुझ को लिखूँ ख़त हरकत हाथ से गुम है
ख़ामा भी मिरे हाथ में अंगुश्त-ए-शशुम है

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'




सैलाब से आँखों के रहते हैं ख़राबे में
टुकड़े जो मिरे दिल के बस्ते हैं दो-आबे में

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'




ये रिंद दे गए लुक़्मा तुझे तो उज़्र न मान
तिरा तो शैख़ तनूर ओ शिकम बराबर है

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'