शिकवा किया ज़माने का तो उस ने ये कहा
जिस हाल में हो ज़िंदा रहो और ख़ुश रहो
अनवर सदीद
खुली ज़बान तो ज़र्फ़ उन का हो गया ज़ाहिर
हज़ार भेद छुपा रक्खे थे ख़मोशी में
अनवर सदीद
कोई भी पेचीदगी हाएल नहीं अनवर-'सदीद'
ज़िंदगी है सामने मंज़र-ब-मंज़र और मैं
अनवर सदीद
पँख हिला कर शाम गई है इस आँगन से
अब उतरेगी रात अनोखी यादों वाली
अनवर सदीद
सैल-ए-ज़माँ में डूब गए मशहूर-ए-ज़माना लोग
वक़्त के मुंसिफ़ ने कब रक्खा क़ाएम उन का नाम
अनवर सदीद
उस के बग़ैर ज़िंदगी कितनी फ़ुज़ूल है
तस्वीर उस की दिल से जुदा कर के देखते
अनवर सदीद
ज़मीं का रिज़्क़ हूँ लेकिन नज़र फ़लक पर है
कहो फ़लक से मिरे रास्ते से हट जाए
अनवर सदीद
यूँ तसल्ली को तो इक याद भी काफ़ी थी मगर
दिल को तस्कीन तिरे लौट के आने से मिली
अनवर सदीद
ख़ाक हूँ लेकिन सरापा नूर है मेरा वजूद
इस ज़मीं पर चाँद सूरज का नुमाइंदा हूँ मैं
अनवर सदीद

