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अख़्तर सईद ख़ान शायरी | शाही शायरी

अख़्तर सईद ख़ान शेर

27 शेर

ना-उमीदी हर्फ़-ए-तोहमत ही सही क्या कीजिए
तुम क़रीब आते नहीं हो और ख़ुदा मिलता नहीं

अख़्तर सईद ख़ान




मुझे अब देखती है ज़िंदगी यूँ बे-नियाज़ाना
कि जैसे पूछती हो कौन हो तुम जुस्तुजू क्या है

अख़्तर सईद ख़ान




मिरा फ़साना हर इक दिल का माजरा तो न था
सुना भी होगा किसी ने तो क्या सुना होगा

अख़्तर सईद ख़ान




मैं सफ़र में हूँ मगर सम्त-ए-सफ़र कोई नहीं
क्या मैं ख़ुद अपना ही नक़्श-ए-कफ़-ए-पा हूँ क्या हूँ

अख़्तर सईद ख़ान




किसी के तुम हो किसी का ख़ुदा है दुनिया में
मिरे नसीब में तुम भी नहीं ख़ुदा भी नहीं

अख़्तर सईद ख़ान




आ कि मैं देख लूँ खोया हुआ चेहरा अपना
मुझ से छुप कर मिरी तस्वीर बनाने वाले

अख़्तर सईद ख़ान




किस जुर्म-ए-आरज़ू की सज़ा है ये ज़िंदगी
ऐसा तो ऐ ख़ुदा मैं गुनहगार भी नहीं

अख़्तर सईद ख़ान




खुली आँखों नज़र आता नहीं कुछ
हर इक से पूछता हूँ वो गया क्या

अख़्तर सईद ख़ान




कौन जीने के लिए मरता रहे
लो सँभालो अपनी दुनिया हम चले

अख़्तर सईद ख़ान