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अहमद वसी शायरी | शाही शायरी

अहमद वसी शेर

17 शेर

में साँस साँस हूँ घायल ये कौन मानेगा
बदन पे चोट का कोई निशान भी तो नहीं

अहमद वसी




यूँ जागने लगे तिरी यादों के सिलसिले
सूरज गली गली से निकलता दिखाई दे

अहमद वसी




वो करे बात तो हर लफ़्ज़ से ख़ुश्बू आए
ऐसी बोली वही बोले जिसे उर्दू आए

अहमद वसी




तुम्हें तुम्हारे अलावा भी कुछ नज़र आए
गर अपने आइना-ख़ानों से तुम निकल आ आओ

अहमद वसी




तुझ से समझौते की है शर्त यही ए दुनिया
जब इशारा मैं करूँ मेरी तरफ़ तू आए

अहमद वसी




थक के यूँ पिछले पहर सौ गया मेरा एहसास
रात भर शहर में आवारा फिरा हो जैसे

अहमद वसी




रोती आँखों को हँसाने का हुनर ले के चलो
घर से निकलो तो ये सामान-ए-सफ़र ले के चलो

अहमद वसी




फिर चाँदनी लगे तिरी परछाईं की तरह
फिर चाँद तेरी शक्ल में ढलता दिखाई दे

अहमद वसी




मुद्दत के बा'द आइना कल सामने पड़ा
देखी जो अपनी शक्ल तो चेहरा उतर गया

अहमद वसी