उजली उजली ख़्वाहिशों पर नींद की चादर न डाल
याद के रौज़न से कुछ ताज़ा हवा भी आएगी
अफ़ज़ल मिनहास
लोग मेरी मौत के ख़्वाहाँ हैं 'अफ़ज़ल' किस लिए
चंद ग़ज़लों के सिवा कुछ भी नहीं सामान में
अफ़ज़ल मिनहास
रस्ते में कोई पेड़ जो मिल जाए तो बैठूँ
वो बार उठाया है कि दिखने लगे शाने
अफ़ज़ल मिनहास
सत्ह-ए-दरिया पर उभरने की तमन्ना ही नहीं
अर्श पर पहुँचे हुए हैं जब से गहराई मिली
अफ़ज़ल मिनहास
तुझ को सुकूँ नहीं है तो मिट्टी में डूब जा
आबाद इक जहान ज़मीं की तहों में है
अफ़ज़ल मिनहास
उजली उजली ख़्वाहिशों पर नींद की चादर न डाल
याद के रौज़न से कुछ ताज़ा हवा भी आएगी
अफ़ज़ल मिनहास
ये भी शायद ज़िंदगी की इक अदा है दोस्तो
जिस को साथी मिल गया वो और तन्हा हो गया
अफ़ज़ल मिनहास
ज़िंदगी की ज़ुल्मतें अपने लहू में रच गईं
तब कहीं जा कर हमें आँखों की बीनाई मिली
अफ़ज़ल मिनहास
ज़िंदगी इतनी परेशाँ है ये सोचा भी न था
उस के अतराफ़ में शोलों का समुंदर देखा
अफ़ज़ल मिनहास

