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विसाल | शाही शायरी
visal

नज़्म

विसाल

सत्यपाल आनंद

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मैं ने कल शब
आसमाँ को गिरते देखा

और सोचा
अब ज़मीं और आसमाँ शायद मिलेंगे

रात गुज़री
और शफ़क़ फूली तो मैं ने

चढ़ते सूरज की कलाई
थाम कर उस से कहा

भाई रुको
तुम दो क़दम आगे बढ़े तो

आसमाँ शायद गिरेगा
ख़शमगीं नज़रों से मुझ को

देख कर सूरज ने आँखें
फेर लीं धीरे से बोला

आसमाँ हर रात गिरता है
मगर दोनों कभी मिलते नहीं हैं!