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साए | शाही शायरी
sae

नज़्म

साए

शहरयार

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उदास शहर की गलियों में रक़्स करते हैं
बलाएँ लेते हैं आवारा-गर्द ख़्वाबों की

दुआएँ देते हैं बिछड़े हुओं को मिलने की
सँवारते हैं ख़म-ए-गैसू-ए-तमन्ना को

पुकारते हैं किसी अजनबी मसीहा को
समेट लेता है जब चाँद अपनी किरनों को

तो दिन के गहरे समुंदर में डूब जाते हैं
यूँही हमेशा तुलू'अ ओ ग़ुरूब होते हैं