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रतजगा | शाही शायरी
ratjaga

नज़्म

रतजगा

शाज़ तमकनत

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अँधेरी रात हवा तेज़ बर्शगाल का शोर
करूँ तो कैसे करूँ शम्अ की निगहबानी

इन आँधियों में कफ़-ए-दस्त का सहारा क्या
कहाँ चले गए तुम सौंप कर ये दौलत-ए-नूर

मिरी हयात तो जुगनू की रौशनी में कटी
न आफ़्ताब से निस्बत न माहताब रफ़ीक़

जनम जनम की सियाही बरस बरस की ये रात
क़दम क़दम का अंधेरा नफ़स नफ़स की ये रात

तुम्हारी निकहत-ए-बर्बाद को तरसती है
अब आओ आ के अमानत सँभाल लो अपनी

तमाम उम्र का ये रतजगा तमाम हुआ
मैं थक गया हूँ मुझे नींद आई जाती है