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फिर सफ़र बे-सम्त बे-मंज़िल हुआ | शाही शायरी
phir safar be-samt be-manzil hua

नज़्म

फिर सफ़र बे-सम्त बे-मंज़िल हुआ

शहरयार

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बर्फ़ बे-मौसम गिरी
चट्टान से मैदान तक

बे-दरख़्तों की ज़मीं
बे-ऊन भेड़ों के लिए

ज़िंदा रहना और मरना दोनों मुश्किल हो गए
आँख बे-मंज़र ख़ला को

तकते तकते थक गई
वक़्त की रफ़्तार को

बतलाने वाली सूइयाँ
हिंदिसों की बे-सिला बेकार गर्दिश करते करते रुक गईं

आड़े तिरछे ऊँचे नीचे रास्ते
बर्फ़ की मोटी तहों में छुप गए

फिर सफ़र बे-सम्त बे-मंज़िल हुआ
बर्फ़ के उजले बदन की

मुनहनी नीली रगों में
कौन सूरज बन के दौड़े

किस तरह ये बर्फ़ पिघले
आग ब-शोला हुई

फिर सफ़र बे-सम्त बे-मंज़िल हुआ
बे-ऊन भेड़ों के लिए

ज़िंदा रहना और मरना दोनों मुश्किल हो गए