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पाम के पेड़ से गुफ़्तुगू | शाही शायरी
pam ke peD se guftugu

नज़्म

पाम के पेड़ से गुफ़्तुगू

साक़ी फ़ारुक़ी

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मुझे सब्ज़ हैरत से क्यूँ देखते हो
वही तितलियाँ जम्अ करने की हाबी

इधर खेंच लाई
मगर तितलियाँ इतनी ज़ीरक हैं

हिजरत के टूटे परों पर
हवा के दोशाले में लिपटी

मिरे ख़ौफ़ से अजनबी जंगलों में
कहीं जा छुपीं...

और थक हार कर वापसी में
सरकते हुए एक पत्थर से बचते हुए

इस तरफ़ मैं ने देखा
तो ऐसा लगा

ये पहाड़ी किसी देव-हैकल फ़रिश्ते का जूता है
तुम कत्थई छाल के तंग मोज़े में

एक पैर डाले
ये जूता पहनने की कोशिश में लंगड़ा रहे...

दूसरी टाँग शायद
किसी आलमी जंग में उड़ गई है

मिरा जाल ख़ाली
मगर दिल मसर्रत के एहसास से भर गया

तुम उसी बाँकपन से
उसी तरहा

गंजी पहाड़ी पर
अपनी हरी विग लगाए खड़े हो

ये हैअत-कज़ाई जो भाई
तो नज़दीक से देखने आ गया हूँ

ज़रा अपने पंखे हिला दो
मुझे अपने दामन की ठंडी हवा दो

बहुत थक गया हूँ