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नज़्म | शाही शायरी
nazm

नज़्म

नज़्म

शबनम अशाई

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अक्सर सोचती हूँ
वो

''मैं'' के वजूद की खोखलाहट थी
जिस में

''तू'' की आवाज़ गूँजती थी
मैं और तू

गुम-गश्ता ज़ात
पर

बात ''मैं'' और ''तू'' की कहाँ
मेरी और तेरी है

मैं
जो मेरी कुछ नहीं लगती

अक्सर सोचती हूँ
शायद

तुम्हारा ''तू'' भी
तुम्हारा न था

न जाने कितने सज्दों की ताबानी
चौखट चौखट

बाँट चुका था
और ख़ामोशी की चादर

ढके
मुझ को

तक रहा था
मैं अक्सर सोचती हूँ

तू वो न था
जिसे मैं ने सोचा था

तू ने या फिर शायद तक़दीर ने
तुझे सर-ता-पा ढक रखा था