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नज़्म | शाही शायरी
nazm

नज़्म

नज़्म

शबनम अशाई

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उस को
तारीख़ से आज़ादी दी गई थी

वो इतना चली
कि उस का

कोई भी नाख़ुन नहीं बचा
बिना नाख़ुन की उँगलियाँ

भद्दी ही नहीं बे-कार हो जाती हैं
फिर वो बहने लगी

और बहती रही
अपनी अनंत धारा में

तारीख़ बहाव की ख़ूब-सूरती क्या समझती
बाँध बाँधे

बिना ये सोचे
कि सड़ाँध पैदा हो जाने पर

दम घुट सकता है
तारीख़ की

मौत वाक़े' हो सकती है