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ना-कर्दा गुनाह | शाही शायरी
na-karda gunah

नज़्म

ना-कर्दा गुनाह

आदिल रज़ा मंसूरी

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बिखर गया
हवा के थपेड़े से

घोंसला
मिलाऊँगा कैसे नज़र

लूट कर आई अगर
चिड़िया