ऐसी क़ुव्वत जो सर्फ़ नहीं होती है
अज़िय्यत बन जाती है
मेरे दिल में कितनी मोहब्बत थी
जिस को ज़माने की बे-मेहरी और सर्द तबीअ'त ने
इज़हार में आने न दिया
आख़िर मैं ने सारा दर्द समेटा
और तेरी आँखों पर वार दिया
दुनिया मेरे लिए तेरी सूरत में
पैमाना हुस्न-ओ-ख़ैर बनी
यूँ तो मोहब्बत फ़र्द से फ़र्द को होती है
लेकिन तुझ से मेरी मोहब्बत
वो नुक़्ता है जिस के चारों तरफ़
आफ़ाक़ की गर्दिश होती है
नज़्म
मोहब्बत
सलीम अहमद

