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मोहब्बत | शाही शायरी
mohabbat

नज़्म

मोहब्बत

सलीम अहमद

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ऐसी क़ुव्वत जो सर्फ़ नहीं होती है
अज़िय्यत बन जाती है

मेरे दिल में कितनी मोहब्बत थी
जिस को ज़माने की बे-मेहरी और सर्द तबीअ'त ने

इज़हार में आने न दिया
आख़िर मैं ने सारा दर्द समेटा

और तेरी आँखों पर वार दिया
दुनिया मेरे लिए तेरी सूरत में

पैमाना हुस्न-ओ-ख़ैर बनी
यूँ तो मोहब्बत फ़र्द से फ़र्द को होती है

लेकिन तुझ से मेरी मोहब्बत
वो नुक़्ता है जिस के चारों तरफ़

आफ़ाक़ की गर्दिश होती है