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मीनूपाज़ | शाही शायरी
minupaz

नज़्म

मीनूपाज़

शहनाज़ नबी

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उबल उबल कर
दूध के सारे ताल-तलइयाँ

सूख गए हुमक हुमक कर
कुंदन सी लोरी के बोल भी रूठ गए

पेंगें लेते लेते
ख़ाली बाँहें

थक कर झूल गईं
कजलोटी में सारा काजल जाने कब का पिघल गया

किस मेले में ढूँडूँ उस को
मिला नहीं और बिछड़ गया