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मश्क़ | शाही शायरी
mashq

नज़्म

मश्क़

शारिक़ कैफ़ी

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तो वो सब मश्क़ थी
बे-पर्दगी की

जो मुझे पिछले कई एक साल से उन अस्पतालों में कराई जा रही थी
जहाँ पर क़ैद था मैं

कभी मुझ को मिरे ही फेफड़ों की एक्स-रे में क़ैद तस्वीरें दिखा कर
कभी पेशाब की थैली लगा कर

कि मैं पूरी तरह बे-शर्म हो जाऊँ
उस इक लम्हे के आने तक

जब इक अंजान हाथ
ग़ुस्ल के तख़्ते पे बिल्कुल बे-झिजक

उज़्व-ए-तनासुल में मिरे
पेशाब की बूँदें टटोले

और मुझे जैसे जहाँ जी चाहे छू ले