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मरता लम्हा | शाही शायरी
marta lamha

नज़्म

मरता लम्हा

साक़ी फ़ारुक़ी

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इस लम्हे की हम-राही महसूस करो
इस से तुम्हारा बस इतना ही रिश्ता है

इस की राह का इक बे-मसरफ़ पत्थर हो
इस का दिल कोंपल की तरह मुलाएम है

इस दुनिया और इस के दुखों के बारे में
जब कोई बात सुनेगा कुम्हला जाएगा

ख़ामोशी से इस के साए साए चलो
और अगर कोई बात ही इस से करनी है

आने वाले अच्छे दिनों की बात करो