सलाख़ों से उधर
कुछ दरख़्त, एक सड़क, कुत्ते की ज़ंजीर थामे एक आदमी
और एक डोर जिस पर रंग-बिरंगे कपड़े सूख रहे हैं
जिस्मों के बग़ैर ये कपड़े, बच्चों के बग़ैर ये मैदान
मोहब्बत के बग़ैर ये रास्ते
दुनिया कितनी छोटी नज़र आती है
रंग-बिरंगे कपड़े सूख जाने पर
एक औरत आएगी
तब एक एक कर के ये क़मीज़ें, पतलूनें और फ़राकें
अपने अपने जिस्म हासिल कर लेंगे
तब मैदान बच्चों से
और बच्चे ख़ुशी से भर जाएँगे
ये छोटी सी काएनात रंगों से भर जाएगी
इतने बहुत से रंग
ऐ औरत, इतने बहुत से रंग!
नज़्म
इतने बहुत से रंग
सरवत हुसैन

