ज़िंदगी को शो'बदा समझा था मैं
पत्थरों को आइना समझा था मैं
धूप की यूरिश थी हर इक सम्त से
साया-ए-दीवार से लिपटा था मैं
आईने ही आईने थे हर तरफ़
फिर भी अपने आप में तन्हा था मैं
हादसों से खेलने के बावजूद
आज भी वैसा हूँ कल जैसा था मैं
रोज़ ज़ख़्मी होता था मेरा बदन
पत्थरों के शहर में रहता था मैं
उम्र-भर अपने तआ'क़ुब में 'ज़फ़र'
अपने ही साए से बस उलझा था मैं
ग़ज़ल
ज़िंदगी को शो'बदा समझा था मैं
ज़फ़र इक़बाल ज़फ़र

