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शब-ए-महताब भी अपनी भरी-बरसात भी अपनी | शाही शायरी
shab-e-mahtab bhi apni bhari-barsat bhi apni

ग़ज़ल

शब-ए-महताब भी अपनी भरी-बरसात भी अपनी

ज़हीर काश्मीरी

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शब-ए-महताब भी अपनी भरी-बरसात भी अपनी
तुम्हारे दम-क़दम से ज़िंदगी थी ज़िंदगी अपनी

यहाँ पाबंदी, नाराज़ी, जुनूनी बात है वर्ना
जमाल-ए-यार से कुछ कम नहीं ताबिंदगी अपनी

मुझे शादाबी-ए-सेहने-ए-चमन से ख़ौफ़ आता है
यही अंदाज़ थे जब लूट गई थी ज़िंदगी अपनी

तुम्हारा ग़म इसे आशोब-ए-सर-सर बचाए गा
हवाओं से भड़क उट्ठी है शम-ए-ज़िंदगी अपनी

मगर तुम भी तो इक बू-ए-गुरेज़ाँ की तरह निकले
गुज़रने को गुज़र जाती बहार-ए-दोस्ती अपनी

ज़हीर इस चश्म-ए-अव्वल पे यूँही महसूस होता है
बड़ी मुद्दत से है जैसे किसी से दोस्ती अपनी