शब-ए-महताब भी अपनी भरी-बरसात भी अपनी
तुम्हारे दम-क़दम से ज़िंदगी थी ज़िंदगी अपनी
यहाँ पाबंदी, नाराज़ी, जुनूनी बात है वर्ना
जमाल-ए-यार से कुछ कम नहीं ताबिंदगी अपनी
मुझे शादाबी-ए-सेहने-ए-चमन से ख़ौफ़ आता है
यही अंदाज़ थे जब लूट गई थी ज़िंदगी अपनी
तुम्हारा ग़म इसे आशोब-ए-सर-सर बचाए गा
हवाओं से भड़क उट्ठी है शम-ए-ज़िंदगी अपनी
मगर तुम भी तो इक बू-ए-गुरेज़ाँ की तरह निकले
गुज़रने को गुज़र जाती बहार-ए-दोस्ती अपनी
ज़हीर इस चश्म-ए-अव्वल पे यूँही महसूस होता है
बड़ी मुद्दत से है जैसे किसी से दोस्ती अपनी
ग़ज़ल
शब-ए-महताब भी अपनी भरी-बरसात भी अपनी
ज़हीर काश्मीरी

