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मिलना था इत्तिफ़ाक़ बिछड़ना नसीब था | शाही शायरी
milna tha ittifaq bichhaDna nasib tha

ग़ज़ल

मिलना था इत्तिफ़ाक़ बिछड़ना नसीब था

अंजुम रहबर

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मिलना था इत्तिफ़ाक़ बिछड़ना नसीब था
वो उतनी दूर हो गया जितना क़रीब था

मैं उस को देखने को तरसती ही रह गई
जिस शख़्स की हथेली पे मेरा नसीब था

बस्ती के सारे लोग ही आतिश-परस्त थे
घर जल रहा था और समुंदर क़रीब था

मरियम कहाँ तलाश करे अपने ख़ून को
हर शख़्स के गले में निशान-ए-सलीब था

दफ़ना दिया गया मुझे चाँदी की क़ब्र में
मैं जिस को चाहती थी वो लड़का ग़रीब था