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क्यूँ किसी से वफ़ा करे कोई | शाही शायरी
kyun kisi se wafa kare koi

ग़ज़ल

क्यूँ किसी से वफ़ा करे कोई

ज़हीर देहलवी

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क्यूँ किसी से वफ़ा करे कोई
ख़ुद बुरे हों तो क्या करे कोई

जान देने पे जान देता हूँ
ऐसे जीने को क्या करे कोई

नामा-बर की ज़बाँ से डरता हूँ
कुछ न पूछे ख़ुदा करे कोई

लुत्फ़ जब आए शिकवा-संजी का
हम कहें और सुना करे कोई

हासिल-ए-मुददआ-ए-दिल मालूम
क्यूँ कहें इल्तिजा करे कोई

मौत का नाम बेवफ़ाई है
हाए कब तक वफ़ा करे कोई