क्यूँ किसी से वफ़ा करे कोई
ख़ुद बुरे हों तो क्या करे कोई
जान देने पे जान देता हूँ
ऐसे जीने को क्या करे कोई
नामा-बर की ज़बाँ से डरता हूँ
कुछ न पूछे ख़ुदा करे कोई
लुत्फ़ जब आए शिकवा-संजी का
हम कहें और सुना करे कोई
हासिल-ए-मुददआ-ए-दिल मालूम
क्यूँ कहें इल्तिजा करे कोई
मौत का नाम बेवफ़ाई है
हाए कब तक वफ़ा करे कोई
ग़ज़ल
क्यूँ किसी से वफ़ा करे कोई
ज़हीर देहलवी

