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कुफ़्र में भी हम रहे क़िस्मत से ईमाँ की तरफ़ | शाही शायरी
kufr mein bhi hum rahe qismat se iman ki taraf

ग़ज़ल

कुफ़्र में भी हम रहे क़िस्मत से ईमाँ की तरफ़

ज़हीर देहलवी

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कुफ़्र में भी हम रहे क़िस्मत से ईमाँ की तरफ़
शुक्र है काबा भी निकला कू-ए-जानाँ की तरफ़

कुछ असीरान-ए-क़फ़स के बख़्त ही बरगश्ता हैं
बू-ए-गुल फिर फिर गई उल्टी गुलिस्ताँ की तरफ़

देखते मर कर किसी पर लुत्फ़-ए-उम्र-ए-जाविदाँ
क्यूँ गए ख़िज़्र ओ सिकंदर आब-ए-हैवाँ की तरफ़

देखिए क्या गुल खिलाए फ़स्ल-ए-गुल आती तो है
हाथ अभी से दौड़ते हैं जैब ओ दामाँ की तरफ़

रश्क कहता है कि पोंछे होंगे उस से अश्क-ए-ग़ैर
हाथ उठ कर रह गया सौ बार दामाँ की तरफ़