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कमाल-ए-जोश-ए-जुनूँ में रहा मैं गर्म-ए-तवाफ़ | शाही शायरी
kamal-e-josh-e-junun mein raha main garm-e-tawaf

ग़ज़ल

कमाल-ए-जोश-ए-जुनूँ में रहा मैं गर्म-ए-तवाफ़

अल्लामा इक़बाल

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कमाल-ए-जोश-ए-जुनूँ में रहा मैं गर्म-ए-तवाफ़
ख़ुदा का शुक्र सलामत रहा हरम का ग़िलाफ़

ये इत्तिफ़ाक़ मुबारक हो मोमिनों के लिए
कि यक ज़बाँ हैं फ़क़ीहान-ए-शहर मेरे ख़िलाफ़

तड़प रहा है फ़लातूँ मियान-ए-ग़ैब ओ हुज़ूर
अज़ल से अहल-ए-ख़िरद का मक़ाम है आराफ़

तिरे ज़मीर पे जब तक न हो नुज़ूल-ए-किताब
गिरह-कुशा है न 'राज़ी' न साहिब-ए-कश्शाफ़

सुरूर ओ सोज़ में ना-पाएदार है वर्ना
मय-ए-फ़रंग का तह-ए-जुरआ भी नहीं ना-साफ़