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इसे मंज़ूर नहीं छोड़ झगड़ता क्या है | शाही शायरी
ise manzur nahin chhoD jhagaDta kya hai

ग़ज़ल

इसे मंज़ूर नहीं छोड़ झगड़ता क्या है

ज़फ़र इक़बाल

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इसे मंज़ूर नहीं छोड़ झगड़ता क्या है
दिल ही कम-माया है अपना तो अकड़ता क्या है

अपने सोए हुए सूरज की ख़बर ले जा कर
इस कमीं-गाह में किरनों को पकड़ता क्या है

जानता है कि उतर जाएगी दिल में मिरी बात
वर्ना सुन ले तू बता तेरा बिगड़ता क्या है

शबनम-ए-ताज़ा है ये फूल हैं या पते हैं
देख शाख़-ए-शजर-ए-शाम से झड़ता क्या है

दो क़दम है शब-ए-ग़म से शब-ए-वादा ऐ दिल
चंद आहों के सिवा राह में पड़ता क्या है

दिल तो भरपूर समुंदर है 'ज़फ़र' क्या कीजे
दो घड़ी बैठ के रोने से नबड़ता क्या है