इसे मंज़ूर नहीं छोड़ झगड़ता क्या है
दिल ही कम-माया है अपना तो अकड़ता क्या है
अपने सोए हुए सूरज की ख़बर ले जा कर
इस कमीं-गाह में किरनों को पकड़ता क्या है
जानता है कि उतर जाएगी दिल में मिरी बात
वर्ना सुन ले तू बता तेरा बिगड़ता क्या है
शबनम-ए-ताज़ा है ये फूल हैं या पते हैं
देख शाख़-ए-शजर-ए-शाम से झड़ता क्या है
दो क़दम है शब-ए-ग़म से शब-ए-वादा ऐ दिल
चंद आहों के सिवा राह में पड़ता क्या है
दिल तो भरपूर समुंदर है 'ज़फ़र' क्या कीजे
दो घड़ी बैठ के रोने से नबड़ता क्या है
ग़ज़ल
इसे मंज़ूर नहीं छोड़ झगड़ता क्या है
ज़फ़र इक़बाल

