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हर शय मुसाफ़िर हर चीज़ राही | शाही शायरी
har shai musafir har chiz rahi

ग़ज़ल

हर शय मुसाफ़िर हर चीज़ राही

अल्लामा इक़बाल

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हर शय मुसाफ़िर हर चीज़ राही
क्या चाँद तारे क्या मुर्ग़ ओ माही

तू मर्द-ए-मैदाँ तू मीर-ए-लश्कर
नूरी हुज़ूरी तेरे सिपाही

कुछ क़द्र अपनी तू ने न जानी
ये बे-सवादी ये कम-निगाही

दुनिया-ए-दूँ की कब तक ग़ुलामी
या राहेबी कर या पादशाही

पीर-ए-हरम को देखा है मैं ने
किरदार-ए-बे-सोज़ गुफ़्तार वाही