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हर बे-ज़बाँ को शोला-नवा कह लिया करो | शाही शायरी
har be-zaban ko shoala-nawa kah liya karo

ग़ज़ल

हर बे-ज़बाँ को शोला-नवा कह लिया करो

क़तील शिफ़ाई

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हर बे-ज़बाँ को शोला-नवा कह लिया करो
यारो सुकूत ही को सदा कह लिया करो

ख़ुद को फ़रेब दो कि न हो तल्ख़ ज़िंदगी
हर संग-दिल को जान-ए-वफ़ा कह लिया करो

गर चाहते हो ख़ुश रहें कुछ बंदगान-ए-ख़ास
जितने सनम हैं उन को ख़ुदा कह लिया करो

यारो ये दौर ज़ोफ़-ए-बसारत का दौर है
आँधी उठे तो उस को घटा कह लिया करो

इंसान का अगर क़द-ओ-क़ामत न बढ़ सके
तुम इस को नक़्स-ए-आब-ओ-हवा कह लिया करो

अपने लिए अब एक ही राह-ए-नजात है
हर ज़ुल्म को रज़ा-ए-ख़ुदा कह लिया करो

ले दे के अब यही है निशान-ए-ज़िया 'क़तील'
जब दिल जले तो इस को दिया कह लिया करो