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हम सोचते हैं रात में तारों को देख कर | शाही शायरी
hum sochte hain raat mein taron ko dekh kar

ग़ज़ल

हम सोचते हैं रात में तारों को देख कर

चकबस्त ब्रिज नारायण

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हम सोचते हैं रात में तारों को देख कर
शमएँ ज़मीन की हैं जो दाग़ आसमाँ के हैं

जन्नत में ख़ाक बादा-परस्तों का दिल लगे
नक़्शे नज़र में सोहबत पीर-ए-मुग़ाँ के हैं

अपना मक़ाम शाख़-ए-बुरीदा है बाग़ में
गुल हैं मगर सताए हुए बाग़बाँ के हैं

इक सिलसिला हवस का है इंसाँ की ज़िंदगी
इस एक मुश्त-ए-ख़ाक को ग़म दो-जहाँ के हैं