हद हो चक्की है शर्म-ए-शकेबाई ख़त्म हो
बेहतर है अब दुआ की पज़ीराई ख़त्म हो
लेंगे हिसाब मुझ से अभी लफ़्ज़ लफ़्ज़ का
यानी ज़रा ये अंजुमन-आराई ख़त्म हो
देखा है इस नवाह में वो कुछ कि ऐ ख़ुदा
अब तो यही दिखा कि ये बीनाई ख़त्म हो
मुमकिन है मुंतज़िर हो कोई ख़ाक-ए-ख़ुश-ख़िसाल
शायद कहीं ये साहिल-ए-रुस्वाई ख़त्म हो
है दूद ख़ाक-दार बहुत पाक हो हवा
पानी है ज़ेर-ए-बार बहुत काई ख़त्म हो
ख़ुश-रंग में घुला हुआ बद-रंग हो जुदा
और शोर में छुपी हुई तन्हाई ख़त्म हो
अपने मुक़ाबिल आप ही आ जाऊँगा कभी
तंग आ चुका हूँ अब मिरी यकताई ख़त्म हो
आकर वो मेरी बात सुने और जवाब दे
गर यूँ नहीं तो फिर ये शनासाई ख़त्म हो
बाज़ार-ए-बोसा तेज़ से है तेज़-तर 'ज़फ़र'
उम्मीद तो नहीं कि ये महँगाई ख़त्म हो
ग़ज़ल
हद हो चक्की है शर्म-ए-शकेबाई ख़त्म हो
ज़फ़र इक़बाल

