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अब किसी से मिरा हिसाब नहीं | शाही शायरी
ab kisi se mera hisab nahin

ग़ज़ल

अब किसी से मिरा हिसाब नहीं

जौन एलिया

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अब किसी से मिरा हिसाब नहीं
मेरी आँखों में कोई ख़्वाब नहीं

ख़ून के घूँट पी रहा हूँ मैं
ये मिरा ख़ून है शराब नहीं

मैं शराबी हूँ मेरी आस न छीन
तू मिरी आस है सराब नहीं

नोच फेंके लबों से मैं ने सवाल
ताक़त-ए-शोख़ी-ए-जवाब नहीं

अब तो पंजाब भी नहीं पंजाब
और ख़ुद जैसा अब दो-आब नहीं

ग़म अबद का नहीं है आन का है
और इस का कोई हिसाब नहीं

बूदश इक रू है एक रू या'नी
इस की फ़ितरत में इंक़लाब नहीं