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आशिक़ी जाँ-फ़ज़ा भी होती है | शाही शायरी
aashiqi jaan-faza bhi hoti hai

ग़ज़ल

आशिक़ी जाँ-फ़ज़ा भी होती है

असरार-उल-हक़ मजाज़

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आशिक़ी जाँ-फ़ज़ा भी होती है
और सब्र-आज़मा भी होती है

रूह होती है कैफ़-परवर भी
और दर्द-आश्ना भी होती है

हुस्न को कर न दे ये शर्मिंदा
इश्क़ से ये ख़ता भी होती है

बन गई रस्म बादा-ख़्वारी भी
ये नमाज़ अब क़ज़ा भी होती है

जिस को कहते हैं नाला-ए-बरहम
साज़ में वो सदा भी होती है

क्या बता दो 'मजाज़' की दुनिया
कुछ हक़ीक़त-नुमा भी होती है