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आँखों से दूर सुब्ह के तारे चले गए | शाही शायरी
aankhon se dur subh ke tare chale gae

ग़ज़ल

आँखों से दूर सुब्ह के तारे चले गए

शकील बदायुनी

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आँखों से दूर सुब्ह के तारे चले गए
नींद आ गई तो ग़म के नज़ारे चले गए

दिल था किसी की याद में मसरूफ़ और हम
शीशे में ज़िंदगी को उतारे चले गए

अल्लाह रे बे-ख़ुदी कि हम उन के ही रू-ब-रू
बे-इख़्तियार उन्ही को पुकारे चले गए

मुश्किल था कुछ तो ऐश की बाज़ी का जीतना
कुछ जीतने के ख़ौफ़ से हारे चले गए

नाकामी-ए-हयात का करते भी क्या गिला
दो दिन गुज़ारना थे गुज़ारे चले गए

तर्ग़ीब-ए-तर्क-ए-शौक़ के पर्दे में ग़म-गुसार
हर नक़्श-ए-आरज़ू को उभारे चले गए

पहुँचाई किस ने दावत-ए-मय अहल-ए-ज़ोहद को
शायद तिरी नज़र के इशारे चले गए

वो दिल हरीफ़-ए-जल्वा-ए-फ़िरदौस बन गया
जिस दिल में तेरे ग़म के शरारे चले गए

उन के बग़ैर ज़ीस्त ब-हर-हाल ज़ीस्त थी
जैसी गुज़ारनी थी गुज़ारे चले गए

जल्वे कहाँ जो ज़ौक़-ए-तमाशा नहीं 'शकील'
नज़रें चली गईं तो नज़ारे चले गए