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मोहसिन भोपाली शायरी | शाही शायरी

मोहसिन भोपाली शेर

26 शेर

रौशनी हैं सफ़र में रहते हैं
वक़्त की रहगुज़र में रहते हैं

मोहसिन भोपाली




लफ़्ज़ों के एहतियात ने मअ'नी बदल दिए
इस एहतिमाम-ए-शौक़ में हुस्न-ए-असर गया

मोहसिन भोपाली




लफ़्ज़ों को ए'तिमाद का लहजा भी चाहिए
ज़िक्र-ए-सहर बजा है यक़ीन-ए-सहर भी है

मोहसिन भोपाली




'मोहसिन' अपनाइयत की फ़ज़ा भी तो हो
सिर्फ़ दीवार-ओ-दर को मकाँ मत समझ

मोहसिन भोपाली




'मोहसिन' और भी निखरेगा इन शेरों का मफ़्हूम
अपने आप को पहचानेंगे जैसे जैसे लोग

मोहसिन भोपाली




नैरंगी-ए-सियासत-ए-दौराँ तो देखिए
मंज़िल उन्हें मिली जो शरीक-ए-सफ़र न थे

मोहसिन भोपाली




पहले जो कहा अब भी वही कहते हैं 'मोहसिन'
इतना है ब-अंदाज़-ए-दिगर कहने लगे हैं

मोहसिन भोपाली




उस को चाहा था कभी ख़ुद की तरह
आज ख़ुद अपने तलबगार हैं हम

मोहसिन भोपाली




ज़िंदगी गुल है नग़्मा है महताब है
ज़िंदगी को फ़क़त इम्तिहाँ मत समझ

मोहसिन भोपाली