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मतीन नियाज़ी शायरी | शाही शायरी

मतीन नियाज़ी शेर

26 शेर

कभी कभी तो मोहब्बत की ज़िंदगी के लिए
ख़ुद उन को हम ने उभारा है बरहमी के लिए

मतीन नियाज़ी




हुस्न की बे-रुख़ी को अहल-ए-नज़र
हासिल-ए-इल्तिफ़ात कहते हैं

मतीन नियाज़ी




हो न जब तक 'मतीन' कैफ़-ए-ग़म
आदमी को ख़ुदा नहीं मिलता

मतीन नियाज़ी




हम तो आशुफ़्ता-सरी से न सँवरने पाए
आप से क्यूँ न सँवारा गया गेसू अपना

मतीन नियाज़ी




आए थे बे-नियाज़ तिरी बारगाह में
जाते हैं इक हुजूम-ए-तमन्ना लिए हुए

मतीन नियाज़ी




गुलशन के परस्तारो तुम को तो पता होगा
वो कौन हैं आख़िर जो कलियों को मसलते हैं

मतीन नियाज़ी




ग़म-ए-मआल ग़म-ए-ज़िंदगी ग़म-ए-दौराँ
हमारे इश्क़ का चर्चा कहाँ कहाँ न रहा

मतीन नियाज़ी




ग़म-ए-इंसाँ को सीने से लगा लो
ये ख़िदमत बंदगी से कम नहीं है

मतीन नियाज़ी




ग़म की तशरीह हँसी-खेल नहीं है कोई
पहले इंसान तू बिन फिर ये हुनर पैदा कर

मतीन नियाज़ी