तुम्हें तो नाज़ बहुत दोस्तों पे था 'जालिब'
अलग-थलग से हो क्या बात हो गई प्यारे
हबीब जालिब
लाख कहते रहें ज़ुल्मत को न ज़ुल्मत लिखना
हम ने सीखा नहीं प्यारे ब-इजाज़त लिखना
हबीब जालिब
लोग डरते हैं दुश्मनी से तिरी
हम तिरी दोस्ती से डरते हैं
हबीब जालिब
न तेरी याद न दुनिया का ग़म न अपना ख़याल
अजीब सूरत-ए-हालात हो गई प्यारे
हबीब जालिब
पा सकेंगे न उम्र भर जिस को
जुस्तुजू आज भी उसी की है
हबीब जालिब
तुम से पहले वो जो इक शख़्स यहाँ तख़्त-नशीं था
उस को भी अपने ख़ुदा होने पे इतना ही यक़ीं था
हबीब जालिब
उन के आने के बाद भी 'जालिब'
देर तक उन का इंतिज़ार रहा
हबीब जालिब
ये और बात तेरी गली में न आएँ हम
लेकिन ये क्या कि शहर तिरा छोड़ जाएँ हम
हबीब जालिब
उस सितमगर की हक़ीक़त हम पे ज़ाहिर हो गई
ख़त्म ख़ुश-फ़हमी की मंज़िल का सफ़र भी हो गया
हबीब जालिब

