EN اردو
चन्द्रभान ख़याल शायरी | शाही शायरी

चन्द्रभान ख़याल शेर

19 शेर

मिलता नहीं ख़ुद अपने क़दम का निशाँ मुझे
किन मरहलों में छोड़ गया कारवाँ मुझे

चन्द्रभान ख़याल




वो जहाँ चाहे चला जाए ये उस का इख़्तियार
सोचना ये है कि मैं ख़ुद को कहाँ ले जाऊँगा

चन्द्रभान ख़याल




वक़्त और हालात पर क्या तब्सिरा कीजे कि जब
एक उलझन दूसरी उलझन को सुलझाने लगे

चन्द्रभान ख़याल




तुम जिसे समझे हो दुनिया उस के आँचल के तले
गेसुओं के पेच और ख़म के सिवा कुछ भी नहीं

चन्द्रभान ख़याल




तेरी परछाईं सिमटती जाएगी
जैसे जैसे फैलता जाएगा तू

चन्द्रभान ख़याल




सुब्ह आती है दबे पाँव चली जाती है
घेर लेता है मुझे शाम ढले सन्नाटा

चन्द्रभान ख़याल




सोचता हूँ तो और बढ़ती है
ज़िंदगी है कि प्यास है कोई

चन्द्रभान ख़याल




शहर में जुर्म-ओ-हवादिस इस क़दर हैं आज-कल
अब तो घर में बैठ कर भी लोग घबराने लगे

चन्द्रभान ख़याल




पास से देखा तो जाना किस क़दर मग़्मूम हैं
अन-गिनत चेहरे कि जिन को शादमाँ समझा था मैं

चन्द्रभान ख़याल